तब संभल जाते, आज प्याज़ के दाम 50 रुपये न आते

मदन शर्मा/शशांक मिश्रा/सिवनी मालवा। प्याज की कीमतों में उछाल आते ही मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों की भोहें तन जाती है। प्याज़ को रोने से इस कदर जोड़ दिया है कि लगता है कि प्याज़ का काम सिर्फ रुलाना रह गया है। देश में हर चीज़ के दाम लगातार बढ़ते जा रहे है परन्तु उसका किसी से कोई सरोकार नहीं है। पर यदि प्याज के दाम बढ़ गए तो राजनीति से लेकर आम आदमी की जिन्दगी तक में भूचाल आ जाता है। प्याज़ महंगाई का नया मापदंड है क्योंकि नेताओं को लगता है कि प्याज़ से सरकार बदल जाती है।

प्याज झुकता नहीं
21 वी सदी में आपने एक जुमला बहुत सुना होगा की प्यार झुकता नहीं पर आज एक नया जुमला इसकी जगह बोला जाने की प्याज झुकता नहीं। प्याज आम आदमी से लेकर ख़ास आदमी के सलाद से स्वाद तक की रोजमर्रा की जिन्दगी से जुड़ा हुआ माना जाता है। जब प्याज की कीमत में वृद्धि होती है तो कई सरकारें हिल जाती है ऐसा सिर्फ बोला ही नहीं जाता है बल्कि कई सरकारों को सिर्फ प्याज ले डूबा है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो जैसे लोग बर्थडे मनाते है ऐसा प्याज डे मनाया जाने लगेगा।

मध्य प्रदेश के रतलाम में हुये दंगे के बाद आनन फानन में सरकार ने पांच महीने पहले 6 जिलों झाबुआ, रतलाम, खरगोन, विदिशा, धार और सीहोर के  किसानो से आठ रूपये किलो में समर्थन मूल्य पर खरीदी गई प्याज होशंगाबाद की कृषि उपज मंडी के टीन शेड के नीचे लापरवाही के चलते बारिश के पानी में सड़ा दी उस सड़ी प्याज़ को मंडी प्रबंधन ने रातोरात हाईवे 69 के किनारे चोरी से जगह जगह फिंकवा कर मिसाल कायम की थी।

अब वही प्याज आम आदमी का जायका बिगाड़ रही है। प्याज का दाम आमजन की जेब पर भारी पड़ रहा है। जो व्यक्ति दो वक्त की रोटी जैसे तैसे कमा पाता है। प्याज के दाम ने तो उसे प्याज के प्रति उपवास ही करा दिया है।

अगर उस समय अधिकारी इस पर ध्यान देते तो प्रदेश के छह जिलो से होशंगाबाद लगभग 47 हज़ार मेट्रिक टन प्याज भंडारण और बिक्री के लिए लाया गया था। जब इसका दाम दो रूपये और तीन रूपये प्रति किलो के हिसाब से थोक सब्जी व्यापारियों को बेंचा गया था। बाकि प्याज को रखने के लिए कोई गोदाम नहीं होने के कारण मंडी के टीन शेड पर पटक दिया गया था। जो बारिश के पानी की भेंट चढ़ गया था।

तब की गई लापरवाही का खामियाजा अब आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। बाजार में प्याज का दाम 50 से 70 रुपये प्रति किलो के आसपास बना हुआ है। जिसे आमजन को खरीदना महंगा पड़ रहा है, और उसका जायका बिना प्याज के सूना है।

सिवनी मालवा मंडी में प्याज की कीमत 50 से 70 रूपये किलो तक होलसेल में है वही फुटकर में अलग-अलग जगह के अलग-अलग दाम है। दुनिया में प्याज की सबसे बड़ी मंडी लासलगांव (महाराष्ट्र) में है जहाँ पिछले साल प्याज की कीमत सात या साढ़े सात रुपए प्रतिकिलो थी, इस बार वहां दाम तीस से पैंतीस रुपए है। बताया जा रहा है, और सरकार ने भी कहा है, कि इस बार प्याज का रकबा घटा है, जिससे पैदावार कम हुई, और इसी का असर कीमतों पर दिख रहा है। लेकिन कोई चार गुना अंतर के पीछे सिर्फ यही कारण है, या कालाबाजारी और जमाखोरी भी है?

फिर, सवाल यह भी है कि रकबा क्यों घटा? याद रहे, प्याज की पिछली फसल के बाद किसानों का क्या अनुभव रहा था? उपज का वाजिब दाम मिलना तो दूर, लागत भी न निकल पाने के कारण अनेक जगहों से सड़कों पर प्याज फेंके जाने की खबरें आई थीं।

जहां किसानों का ऐसा कटु अनुभव हो, वहां अगर रकबा घट जाए, तो आश्चर्य की बात नहीं है। इस बार कीमत में उछाल है, पर क्या इसका फायदा किसानों को मिल पा रहा है? फायदा किनकी जेब में जा रहा है? आपूर्ति सुधारने के लिए सरकार ने दो हजार करोड़ टन प्याज आयात करने का फैसला किया है। इससे बाजार में आपूर्ति भले सुधर जाएगी, पर प्याज उगाने वाले किसानों का कोई भला नहीं होगा।

रकबा घटने से महंगाई बढ़ने का सीधा सबक यही है कि कुछ भी ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे कृषिकार्य के किसान के जज्बे और मेहनत पर पानी पड़े। भाजपा ने लोकसभा चुनावों में मतदाताओं से मूल्य स्थिरीकरण कोष का वायदा किया था। लेकिन इस वायदे को पूरा करना तो दूर, मोदी सरकार ने इस दिशा में एक कदम भी नहीं बढ़ाया।

यही किसानों के साथ हुआ। मोदी ने वायदा किया था कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनी, तो यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसानों को उनकी उपज का लागत से डेढ़ गुना दाम मिले। लेकिन अपने इस वायदे को वे अब याद नहीं करना चाहते। एक तरफ किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, और दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को भी राहत नहीं है। फिर, चढ़ी हुई कीमतों से कौन चांदी काट रहा है!