इंदौर/राजेन्द्र के.गुप्ता। जहाँ हर अखबार और टीवी चैनल के वो पत्रकार रोज जाते है और लगभग दिनभर रहते है, जिस विभाग से इंसान को जन्म से लेकर मृत्यु तक काम पड़ता हो वही विभाग अपने ही कानून की धज्जियाँ उड़ाए तो आप क्या कहेंगे देश बदल रहा है या भ्रष्टाचार और अनियमित्ता में ढल रहा है ? जिन अफसरों की जिम्मेदारी क़ानून का उल्लंघन रोकने की है वही अफसर शान से क़ानून का उल्लंघन कर निर्माणाधीन बिल्डिंग में बैठे अपने दफ़्तर संचालित कर रहे है। सुरक्षा के लिए लगाई थोड़ी सी नेट देख कर ऐसा लग रहा है मानो घटना होने पर खानापूर्ति में काम आ जाए और जिसकी जान जाए उस पर ही दोष मढ़ दिया जाए । इसे देखते हुए सवाल तो बनता है “कहा होता है कानून सब के लिए बराबर ? “

जिस नगर निगम के अफसरों की जिम्मेदारी है कि बिना पूर्णता प्रमाण-पत्र लिए भवन का उपयोग करने वाले भवन निर्माता के खिलाफ कानून के मुताबिक करवाई करे वही निगम अपनी निर्माणाधिन बिल्डिंग में उस नियम और क़ानून का पालन नही कर रहा है। कोई घटना होने पर सब एक दूसरे पर ढोल देंगे और क़ानून के रखवाले लकीर पीटते रहेंगे। निगम केम्पस में ही क़ानून का एसा मजाक उड़ाया जा रहा है जो निगम अफसरों के लिए ही किसी कानूनी उल्लझन को खड़ा करने के लिए काफ़ी है। अब निगम अफसर जो तर्क देंगे वो आम व्यक्ति या भवन निर्माण करने वाले के लिए ज़्यादा आवश्यक होते होगे! सवाल यह भी उठता है कि ऐसे नियम और क़ानून का क्या औचित्य जिसका पालन उसके रक्षक ही ना करे? ऐसी बुरी स्थिति में सवाल यह भी उठता है कि क्या कानून सब के लिए बराबर है? इसका पालन कहा हो रहा है? कौन मानता है ? क्या देश बदल रहा है या भ्रष्टाचार और अनियमित्ता में जिम्मेदार भी ढल रहे है ?

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