एक यात्रा अतृप्ति से तृप्ति की और 
सिवनी मालवा – उपनगरी बानापुरा की उच्च शिक्षित २४ वर्षीय तृप्ती नेमीचंद कोठारी सांसारिक जीवन का मोह छोड़ जैन धर्म की दीक्षा अंगीकार करने का मन बना चुकी है। जो २२ जनवरी २०१८ में पूना के पास स्थित बारामती नगर में परम पूज्य पन्यास हंसरत्न विजय जी से दीक्षा ग्रहण करेगी।

दीक्षा ग्रहण करने वाले तृप्ती नेमीचंद कोठारी ने बताया कि, बढ़ते कदम अपनी मंजिल की और प्राप्त करने के लिए गुरू के सानिध्य में रहकर गुरू का आर्शीवाद प्राप्त करके परम पूज्य आचार्य श्री अभय शेखर सुरि. जी महाराज साहब द्वारा दिव्य आर्शीवाद प्रदान किया और अनुमति देकर मर्हूत प्रदान किया।
जिस प्रकार भगवान महावीर स्वामी ने अपना भरापूरा परिवार त्यागा, संपत्ति, वैभव, क्षणिक सुख संसार को त्यागा उसी प्रकार भगवान के द्वारा बताएं गए मार्ग पर आरूण होकर जैन धर्म की भगवती दीक्षा अंगीकार करने जा रहंू हँू। संसार में क्षणिक मार्ग सुख का अनुभव होता है और संयम जीवन में सुख ही सुख प्राप्त होता है। सुख ही साधना का  पर्याय बनता है। और मोक्ष तक पहुंचने में पूरी मदद करता है। चारित्र मार्ग से स्वंय का कल्याण करना और धर्म का संदेश जन जन तक पहुंचना यही मेरा धर्म और मेरा कार्य क्षेत्र रहेगा मोक्ष मार्ग प्राप्त करने के लिए। तप, त्याग, धर्म, ध्यान का आलबंन लिया जाता है। चारित्र लेकर सफेद कपड़े पहनने से मात्र साधु कहलाएगा, किंतु सत्य यहीं है कि उसके साथ आत्मीय चिंतन साधना क्रिया तप की जरूरत होती है।
जैन धर्म में विशेष जो प्रथम तीर्थकर आदिनाथ बोले वहीं चौबीवें तीर्थंकर महावीर स्वामी बोलते है और उसी आधार पर साधु साध्वी बोलते है। दूसरे धर्म में भिन्नता मिलती है, हमेशा पैदल ही बिहार करना है, सिर्फ चातुर्मास मेंं एक ही जगह रहकर धर्म आराधना करना है और विशेष में जीव दया का पालन करना होता है। बारिश में हरि वनस्पित, सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति अधिक होती है। इसलिए एक स्थान का चयन करना होता है। उसे चार्तुमास कहा जाता है। और उसी स्थान पर रहना होता है। आठ महीनें का समय पैदल बिहार करके जैन धर्म का संदेश देना यही साधु जीवन है।
पयूर्षण पर्व आता है,  जो साल में एक ही बार आता है उसमें प्रमुख क्षमापना होती है जो संघ के सभी व्यक्ति क्षमापना दिवस के रूप में मनाते है और एक दूसरे से क्षमा मांग कर अपने कर्मो का क्षय करते है। भगवान ने दो प्रकार के धर्म बताए साधु धर्म और श्रावक धर्म। साधु धर्म में किसी भी प्रकार की छूट नहीं दी जाती है जबकि श्रावक धर्म गृहस्थ होने के कारण उसी प्रकार से धर्म का अनुसरण करता है। और अपने पापों का नाश करता है। उपर्युक्त सभी बातों का मनन करने के बाद में मैने यह फैसला लिया और अपने माता पिता की आज्ञा लेकर इस समय व्रत को २२ जनवरी २०१८ के दिन बरामती नगर (पूना)में पूज्य महाराज साहब पन्यास हंसरत्न विजय जी के वरद् हस्तों से दीक्षा अंगीकार करूंगी। ये महान संत अपनी तपस्या में ही लीन रहते है। आपने वर्तमान चार्तुमास कोल्हापुर में रहकर लगातार चार महीनों का उपवास मतलब १२३ दिनों का उपवास रखा है। जिसमें सिर्फ पीने का गरम पानी होता है।