शशांक मिश्रा/सिवनी मालवा। मंगलवार को कृषि उपज मंडी बानापुरा में किसान अपनी अपनी उड़द की उपज मंडी प्रांगण में कतार लगाकर एवं अपनी उड़द की बोरी के पास बैठकर व्यापारियों का आने का इंतजार ऐसे कर रहे थे ऐसे भक्त भगवान के दर्शन के लिए लालायित हो। मंडी में किसान तीन-तीन दिन से अपनी उड़द बोरियों में लिए बैठे हैं। जब अधिकारी, व्यापारी, नेता, समाजसेवी, अपने अपने घरों में मखमली रजाई ओढ़ कर सो रहा है वही रात्रि में किसान उड़द के कारण खुले आसमान के नीचे उड़द की बोरियों के ऊपर अपनी रात काटने को मजबूर है।

आज मंडी में उड़द की खरीदी व्यापारियों द्वारा शाम 5:00 बजे तक की गई परंतु आज दिनांक 12 दिसंबर को मंडी में आये किसानो की उड़द नहीं खरीदी गई, उन्हें बताया गया कि आपकी उड़द अगले दिन खरीदी जाएगी। किसानों को मजबूरन रात में भगवान की छत खुले आसमान के नीचे ही बिताना पड़ेगा। जबकि मंडी प्रशासन चाहता तो 2 घंटे और उड़द खरीदी जा सकती थी। जिससे किसानों को राहत मिल जाती परंतु यहां किसानों की सुनने वाला कौन है? आज का अन्नदाता अपना क्रोध प्रकट करने रोड पर उतरता है तो यही अधिकारी मिनटों में व्यवस्था कर देते हैं।

आखिर क्यों किसान को रौद्र रूप धारण करने पर मजबूर किया जा रहा है। कहीं ऐसा ना हो कि इटारसी मंडी में किसानों ने अपना गुस्सा जाहिर किया था तो मिनटों में कलेक्टर और पुलिस अधिकारियों ने आ कर व्यवस्था बनाई थी परंतु सिवनी मालवा में ना तो मंडी प्रशासन को चिंता है और प्रशासनिक अधिकारी तो मंडी तरफ झांकना भी नहीं चाह रहे है। जब यही किसान आक्रोशित होकर सड़कों पर आते है तो यही प्रशासनिक अधिकारी किसानो के सामने नतमस्तक नजर आते है। जिसका उदाहरण हम पिछले किसान आन्दोलन में देख चुके है जब किसानो ने मुख्य मार्ग पर घंटों चक्काजाम किया था तब प्रशासन मूक दर्शक बना हुआ था।

आखिर में हमारा अन्नदाता कब तक लाचारी एवं बेबसी में समय गुजारने को मजबूर रहेगा। खाद की समस्या अभी मुंह बाये खड़ी है पर्याप्त बिजली मिल नहीं रही है। गेहूं में पूरा पानी हो नहीं रहा है। उड़द बिक नहीं रही है। भावान्तर की राशि भाव खा रही है। अभी तक नवंबर में बेची उड़द के पैसे भावान्तर रुपी उपहार किसान के पास नहीं आया है। यह उपहार अभी अधिकारियों की टेबल पर ही घूम रहा है। यदि समय पर भावांतर का पैसा आ जाता तो किसानों के लिए खाद बीज की व्यवस्था कर लेता।

अपनी उपज लेकर आये किसान ने बताया की मैं 3 दिन से उड़द लेकर मंडी में बैठा हूं अभी तक नहीं बिकी है। 10 एकड़ में 6 क्विंटल उड़द निकली है जो 1000-1200 तक में बिकेगी। भावान्तर का पैसा कब मिलेगा कह नहीं सकता। गेहूं की बोनी उधार रूपये लेकर करी है। खाद लेना है घर में पैसे नहीं है। अब तो भगवान ही मालिक है। ये है हमारे अन्नदाता की पीड़ा जो सब की थाली में अन्न पहुंचाने का काम करता है परंतु स्वयं की थाली खाली नजर आ रही है। कुछ किसानों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि भैया ये सरकार हमारी समझ से बाहर है। यह समझ नहीं आ रहा है कि यह सरकार हमारी मदद कर रही है या हमें भावान्तर के रूप में भीख दे रही है। अब तो हमें आगामी विधानसभा चुनाव में शिवराज सरकार को अपना मत देने में एक क्या सौ बार सोचना पड़ेगा।

यदि किसान की यही सोच बरक़रार रही तो शिव को अपनी नैया पार लगाने में कठिनाई तो होगी वही किसान संगठन भी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में जुट गए हैं जिसका सीधा असर मंडियों में किसानों के ऊपर हो रहा है। यह शिवराज सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं है।